चाबी चुत की खोली रूप की रानी रूपा ने

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ये वाक्या तब का है जब मेरी नयी नयी नौकरी लगी थी और मेरा पोस्ट एक शहर से बाहर लगी। मैं सुजीत, 27 साल का हटा कटा नौजवान था। मुझे एक रूम की जरूरत थी और गाव के एक दंपति के यहाँ मेरा डील फाइनल हुई। महीने का 4000 रुपये किराया और 3000 रुपये खाने के।

मैं स्टेशन से सीधा पहले घर गया। जहां मेरी मुलाकात संजय से हुई जो मकान का मालिक था। 30 साल का सुंदर अच्छा कद काटी । 2BHK का मकान था संजय का जहां वो अपनी बीवी रूपा (उम्र 26 साल रंग साफ़ मोहक शरीर) के साथ रेहता था।

दोनों की शादी को 2 साल ही हुए थे। परिवार के सब लोगों की मौत एक एक्सीडेंट में हो गई थी कुछ साल पहले। मुझे छत पर एक कमरा दिया गया था। छोटा सा शौचालय था, नहाने के लिए छत पर कोने में ही एक नल था, बाल्टी भरो और नहा लो।

संजय मुझे सब कायदे कानून समझा रहा था और रूपा पीछे घूंघट में खड़ी सुन रही थी। दारु मास मछली कुछ नहीं चलेगा। सिर्फ रिस्तेदार आ सकते मिलने घर पर कोई दोस्त या दफ्तर का साथी नहीं। वगैरह, वगैरह…

ये सब बता कर संजय ने रूपा से बोला चाबी देने को कमरे की। रूपा थोड़ा घूमी और अपनी चोली में हाथ डाल चाबी निकालती है और संजय को देती है। संजय ने मुझे कमरा दिखाया और कहा रात 9 बजे खाना मिलेगा और चला गया।

मैं सुबह 10 बजे काम के लिए निकलता। और चाबी रूपा भाभी को दे कर जाता ताकि थोड़ा साफ़ सफाई करवा दे वो कमरे की। और शाम 8 बजे आकर चाबी ले लेता। रूपा चाबी अपनी चोली में ही रखती हमेशा। धीरे धीरे हम एक दूसरे को जानने लगे और संजय रूपा को मैं अपना सा लगने लगा। हसी मज़ाक चलता बात होती अच्छे से।

एक दिन संजय ने बताया कि किसी कारोबारी मामले की वज़ह से उसे 10-15 दिन के लिये शहर जाना होगा। मैंने कहा आप आराम से जाओ मैं घर और भाभी का ध्यान रखूँगा। संजय को गये 1-2 दिन हुए थे। मैं शाम को दफ्तर से आया और रूपा से चाबी मांगी। वो हमेशा घूम कर पर्दा कर चाबी चोली से निकालती थी।

पर आज ना वो घुमी ना पल्लू किया। अपना पल्लू हटाया और मेरे सामने ही चोली में हाथ डाल चाबी ढूढ़ने लगी। मेरी आंखे फटी की फटी रह गई नजारा देख कर। कसी हुई चोली जिसमें उसके गोरे गोरे दुध बाहर निकलने को बेचैन थे। उसने चाबी निकाल मेरे हाथ में रख दी और कहा खाना तैयार है ले जाओ। मैं खाना ले कर ऊपर आ गया पर मेरे दिमाग में रूपा छा गई थी।

रात भर मैं मूठ मारता रहा पर मन नहीं भरा। अगले दिन मैं सुबह चाबी देने गया और बिना कुछ ज्यादा बात करे दफ्तर निकल गया। तब तक मैं रूपा के इरादे पूरी तरह से समझा नहीं था। गाव का मामला है। कुछ ऊँच नीच हुई तो गाव वाले मुझे छोड़ते नहीं।

उस शाम मैं वापस आया और रूपा को अवाज लगा चाबी मांगी। वो कमरे से बाहर आयी और बोली, “देवर जी आज आप खुद ही लेलो चाबी। मेरे हाथों पे तो मेहंदी लगी आज।“ ये बोल अपने मेहंदी वाले हाथ दिखाने लगी।

मैंने कहा, “अच्छा ठीक है, भाभी। कहाँ रखी है चाबी?”

“सुजीत, तुम्हें तो पता है चाबी कहाँ होती है, लेलो ना!”

मुझे घबराहट सी हुई चाबी तो चोली में होती है। क्या ये मुझे चोली में हाथ डालकर निकालने को बोल रही?

“आप ही बता दो कहाँ रखी है मैं ले लुंगा,” मैंने फिर कहा।

“अरे कल आंखें फाड़ फाड़ देख तो रहे थे। जहां रखी थी हमेशा वहीं तो होती है चोली में। चलो जल्दी से निकालो और नहा धो लो। थक गये होंगे रात भर की मेहनत से,” और वो हस पडी।

मैं सहमा सहमा आगे बड़ा और डरते डरते हाथ चोली की तरफ बढ़ाया। मैं चोली की साइड साइड में देख रहा था दो उँगली से पर कुछ नहीं मिला।

“अरे अंदर गिर गई होगी थोड़ा। और अंदर की तरफ देखो ना। शर्मा क्यू रहे हो?”

मैं थोड़ा उत्तेजित होने लगा। पेंट टाइट होने लगी और मैंने हाथ उसी उत्तेजना में अंदर डाला और रूपा के दुध को मेहसूस करने लगा। मैं चाबी ढूँढ रहा में भूल ही गया और उसके दुध को दबाने और मसलने लगा। वो मुस्करा रही थी।

और उत्तेजना में जब मैंने जोर से उसके दुध दबा दिए तो उसके मुह से जोर से आह की आवाज निकली और मेरा नशा उतरा। मैं घबरा गया और चाबी झट से निकाल ऊपर भाग गया। मेरा लंड जबरदस्त तरह से तना हुया था।

ये सब सपना सा लग रहा था जो अभी मेरे साथ हुआ। और डर लग रहा था कि कहीं रूपा संजय को सब बता ना दे। पर लंड को शांत करने के लिए पहले मूठ मरना बहुत जरूरी था। रात को मैंने ना जाने कितनी बार मूठ मारी की याद नहीं। और कब सो गया पता नहीं।

सुबह जब होश आया तो रात का किस्सा सोचते ही लंड फिर खंडा हो गया। मुझे समझ आया कि पहल तो रूपा ने करी है। मतलब आग वहाँ भी पूरी लगी है। मेरी हिम्मत बढ़ी और मैं नहा कर नीचे गया।

रूपा को अवाज लगा बोला, “भाभी चाबी ले लो।“ वो बाहर आयी और हस्ते हुए बोली लाओ। मैंने कहा, “खुद ले लो। आप भी खुद ले लो जैसे मैंने ली थी कल।“ ये बोल मैंने अपनी टीशर्ट ऊपर की और पाजामे में से हल्की सी चमकती चाबी दिखा दी।

जैसे ही रूपा ने पाजामे की इलास्टिक से हाथ डाला चाबी अंदर चली गई। और रूपा ने बिना हिचके हाथ सीधा अंदर अंडरवियर में डाल दिया। व समय व्यर्थ ना करते होए सीधा मेरे हथियार को मसलने लगी जो की पहले से ही तना हुआ था।

वो मेरे कान के पास आकर बोली, “मुझे तो लगा था तुम रात को ही आकर अपनी प्यास भुजाओं गे। कैसे काटी तुमने पूरी रात? अकेले मैं तो तड़पती करवट लेती रही। अब सुबह आए हों दफ्तर जाने के समय?”

मैंने कहा, “आज कोई दफ्तर नहीं जा रहा,” और ये बोल उसे बाहों में भरा और अंदर उसके बेडरूम में ले गया। मैं इतना उत्तेजित था कि एक पल नहीं रुक पाया और उसकी चोली और लहंगा उतार दिया।

उसे ऊपर से नीचे चूमा फिर जी भर कर उसके दुध दबाये। वो सिसकियाँ ले रही थी। “आह, आह…” और एक हाथ से मेरा लंड सहला भी रही थी। थोड़ी देर बाद वो बोली, “सुजीत अब और मत तड़पाओ। अंदर डाल दो ना अब जानेमान।“

ये बोलते बोलते उसने मेरा लंड अपनी चुत की ओर किया और अंदर डालने का रास्ता दिखाया। मैंने बिना पल गंवाये सीधा एक बार में अपना 7 इंच का मोटा लंड पूरा अंदर घुसा दिया। उसकी हल्की सी चीख निकल गई तो मैंने माफ़ी मांगी गलती की।

“माफ़ करना जान मैं बहुत ज्यादा उत्साहित हूं।“

“कोई बात नहीं, जानेमन, मैं भी अब तुमसे और दूर नहीं रह सकती। अब में पूरी तरह तुम्हारी हूं। तुम चिंता मत करो दर्द की। तुम बस ये आग भूजा दो मेरे जिस्म की।“

मुझे और जोश चड गया और मैं अपना मोटा लंड पूरी जोर से उसकी चुत के अंदर बाहर करने लगा। रूपा सिसकारी लेती रही। रात भर मैंने मूठ मारी थी। अब मेरा लंड इतनी जल्दी झड़ने वाला कहाँ था।

काफी देर चुत मारते मारते मैं थकने लगा। तो उसे बोला, “चलो तुम अब ऊपर आओ मैं थक गया।“

“जानेमन, तुम तो असली मर्द निकले। मेरा तो दो बार हो भी चुका पर तुम तो घोड़े की तरह दौडे चले जा रहे।“

अब रूपा ऊपर आ गयी। और लंड वापस अपनी चुत में डाल अपनी गाँड हिलाने लगी ।मैं अब उसके दुध पकड़ दोनों हाथों से मसलने लगा। और फिर उसे अपनी ओर थोड़ा खीच दुध को मुह में लिया। और चूमते चूमते चूसने लगा।

वो फिर एक बार झड़ गई। उसका गरम रस को में मेहसूस कर रहा था पर मेरी अंदर की आग शांत होने का नाम ही नहीं ले रही थी।

“जानेमन, अब जल्दी करो ना। मैं भी थक रही हूँ। कब होगा तुम्हारा?”

रूपा ने मेरे होंठ से होंठ मिलाये और मुझे फ्रेंच किस करने लगी। और मैं नीचे अपनी कमर से पूरी ताकत लगा अपना लंड उसकी चुत में अंदर बाहर करता रहा। मेरे हाथ उसके दुध पर कसने लगे और मैंने अपनी चोदने की स्पीड तेज कर दी।

मेरी शारीर की सारी नसें जवाब देने लगी थी। और बस तभी मेरा लंड से पानी निकाल गया। मैंने रूपा को अपनी सीने से लगा लिया और लंड उसकी चुत में पूरा अंदर घुसा उसे चूमने लगा। मन कर रहा था मेरा लंड उसकी चुत फाड़ और अंदर घुस जाए।

काफी देर हम दोनों ऐसे ही एक दूसरे से चिपके पड़े रहे। मेरा लंड उसकी चुत में ही रहा। अभी भी एक दम तना हुया। हम दोनों का पानी बाहर बेह रहा। सांसे काबु में नहीं। अभी भी शारिरीक क्षमता पूरी समाप्त।

पर मन की इच्छा अभी और प्यार करने की रूपा के इस सुन्दर शारीर को। रूपा ने मेरी पकड़ से अलग हुई। लंड बाहर निकाल हाथ में लेकर बोली, “जानूं ये तो अभी भी भूखा लग रहा? जाओ थोड़ा गरम पानी से नहा लो। थोड़ा नाश्ता कर लेते हैं। जिस्म में थोड़ी जान आयेगी तो फिर प्यार करेंगे।“

“रूपा जानेमन आज पूरा दिन रात सिर्फ प्यार ही करना है। तुम हो ही इतनी बला की खूबसूरत।“

मैं उठा और फिर नहाने चला गया।

आगे की कहानी अगले पार्ट में। क्यू रूपा ने अपने पति को धोखा दिया और मेरे साथ सम्बंध बनाए?

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